मेरी ये रचना समर्पित है, उस वीरांगना को जिसके साहस ने हमें अपने भीतर झांकने और सोचने का मौका दिया की ताकि हम अपने संसार को और सुन्दर बना सकें।
ऐ पुरुष , पौरुष के नाम पे क्या घिनौना खेल तू
खेल रहा ,
कोई नोच रहा तेरे अर्धांग को, तू मूक तमाशा देख
रहा ।
क्या नहीं है ताकत तुझमें उठा शस्त्र, और काट दे
उस हाथ को,
क्या इतना सम्मान नहीं दे सकता उस साथी के साथ
को ।
क्यों भूल जाता है तुझे ख़ुदा ने उसकी रक्षा को
बनाया है,
क्या तूने अपने पिता, भाई, पति बनने का कर्तव्य
निभाया है।
क्यों उसकी रक्षा सिर्फ इनके वचनों की दासी है,
क्यों उसकी आवाज में तुझे अपनों की आवाज न आती
है ।
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क्यूं तेरी नज़रों का तेज घूरकर उन्हें
कुम्हलाती हैं,
क्यों तेरे हाथों की ताकत उन्हें मसल जाती हैं ।
वो छिपकर घूमती हैं क्योंकि तेरी नजरें नापाक
है,
इसके बाद भी सड़कों पे, शैतानियत घूमती बेबाक है
।
तन्हा रातों को जब उसका साथ, तुझे सूकून दे जाता
है,
फिर क्यों ऐसी रातों में तू, उनकी रूह कंपाता है
।
क्यों उसके आंखों के आंसू, तेरा हृदय नहीं पिघलाते,
क्यों उसके करुण क्रंदन तेरी, रुह चीर नहीं पाते
।
क्या इसी दिन के लिए, विधाता ने तुझे रचा है,
क्या थोड़ा शर्म भी तेरी आखों में नहीं बचा है ।
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दूसरों की क्यों सोचें, खुद के भीतर अंधियारा
है,
जग में रोशनी की बात ही फांकी, घर ही मेरा कारा
है ।
कुछ सपनें, कुछ उम्मीदें, कुछ आस उसने लगाई
तुमसे,
क्यों अपने झूठे नशे में, उसमें आग लगाई तुमने ।
क्यों मर्यादाओं की सीमा, उसके लिए ही खींची जाती,
क्या मर्दों की इज्जत कभी, इज्जत ही नहीं कहलाती
।
उनकी आजादी में छिपा अगर समाज में बवाल है,
तो क्यों नहीं ये हमारे, सामर्थ्य पर ही एक सवाल
है ।
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अंत में यही कहना चाहूँगा;
क्यों भूल जाता है तू जन्मा, उसके ही दर्द से,
सोच क्या मर्द, मर्द बनता है, औरत के दर्द से ।